Sunday, March 8, 2009

ग़ज़ल

मन मेरा कच्ची मटकी सा,

उलटा-पलटा फूट गया।

पड़ा हथोड़ा कड़े बैन का,

दर्पण सा मन टूट गया॥

नहीं समर्पण तेरा मांगा,

चाहा न्यौछावर होना।

कृत्रिमता के तीक्ष्ण ताप से,

प्रेम सरोवर खूट गया॥

भूल गए कसमें वादे सब,

अहं हुआ ऐसा हावी।

हाथों धरा हाथ अपनों का,

पल भर में ही छूट गया॥

उपहासों का पात्र बना मैं,

रख चुप्पी पर मुस्काया।

उसकी जब बारी आई वो,

ज़रा चुहल में रूठ गया॥

रखा भरोसा जिस-जिस पर भी,

उसी-उसी ने छला मुझे।

अपना हित अपना सुख देखा,

"देव" जमाना लूट गया॥

- देवेश

3 comments:

naturica said...

सुन्दर...!

Rajak Haidar said...

रखा भरोसा जिस-जिस पर भी, उसी-उसी ने छला मुझे।
अपना हित अपना सुख देखा, "देव" जमाना लूट गया॥

इन पंक्तियों ने दिलों को छू लिया सर. साथ ही हमारी यादें भी ताजा कर दी. बहुत कुछ कहना है. पर फिलहाल शायद संभव नहीं है. भरोसा टूटने पर कितना दुख होता है. इसको तो वहीं महसूस कर सकता है. जिसका भरोसा किसी ने तोड़ा हो. उम्मीद करता हूं. आप कम शब्दों में ही हमारी बात को समझ गए होंगे.

Anonymous said...

bahut achi gajal hai..