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Wednesday, November 17, 2010

मेरी कामना... सदा के लिए...!!!


मांग रहा हूं मैं ईश्वर से, जग में बढ़े तुम्हारा मान ।
तनबल-धनबल-बुद्धि-रूपबल, ज्ञान-विवेक-तेज-सम्मान ।।
सूरज नौकर, चंदा चाकर, तारे सब हों दास-दासियां ।
सागर से भी बड़ा आपका, हे प्रियवर! हो पुण्य वितान*...।।

   *वितान - विस्तार/शामियाना


Saturday, October 23, 2010

मुलाकात

आज महीनों बाद लिखने का मन किया है। कुछ ज्ञात-अज्ञात कारण भी हैं इसके पीछे। वैसे भी यह काम किसी और के लिए साहित्य की सेवा, सरस्वती की उपासना, समाज को दिशा देने-दिखाने का प्रयास अथवा ऐसा ही कुछ हो सकता है, लेकिन मेरा ऐसे किसी उद्देश्य ऐसे किसी शब्द से कोई वास्ता नहीं है। मेरी तुकबंदियां मेरे लिए सिर्फ और सिर्फ अपनी भावनाओं के इजहार का जरिया भर है। शब्दों के जाल में उलझना-उलझाना तब तक चलता रहेगा, जब तक मन में एहसास जिंदा हैं। फिलहाल इसे पढ़िए:-


चेहरे पे उसके अब वो उजाला नहीं रहा ।
मेहनत की रोटियों का निवाला नहीं रहा ।।


कल वो मिला था मुझको अर्से के बाद में ।
मिलने में मगर उसके रसाला नहीं रहा ।।

कुछ और फड़कती हुई खबर लाईए ।
'कलमाड़ियों' में कोई मसाला नहीं रहा ।।

- देवेश

Tuesday, January 19, 2010

ग़ज़ल

अपने दिल की कही दीवानी कर ले तू ।
बिखरी बातें जोड़ कहानी कर ले तू ।।

कल बिछुडऩ की धूप सहेंगे हम दोनों ।
आज प्रेम की छांव सुहानी कर ले तू ।।

गजलें, कविता, गीत, रूबाई रुस्वां हैं ।
देकर इनको छुअन 'मनानी' कर ले तू ।।

दूर-दूर से मिलना भी ये कैसा मिलना ?
मेरे घर भी आनी-जानी कर ले तू ।।

आंखों-आंखों में कितना बतियाएंगे ।
थोड़ी-थोड़ी बात जुबानी कर ले तू ।।

मत रूठो, मैं हाथ जोड़ता हूं तुमको ।
फिर से आकर प्रीत पुरानी कर ले तू ।।

झूठा, दुष्ट, फरेबी हूं, तो भी तेरा हूं ।
इसी बात से यार 'निभानी' कर ले तू ।।

अब तो मेरा रोना भी नामुमकिन है ।
सब कहते हैं बात सयानी कर ले तू ।।

मिलकर तुझमें 'देव' तुझी सा बन जाए ।
पानी जैसा मुझको पानी कर ले तू ।।

- देवेश

Friday, December 4, 2009

तनहाई

तुमने...

लहरों की तरह आकर,

छू लिया- किनारा मेरे मन का।

... और फिर चले गए,

लहरों की ही तरह....।

इस पर लिखी

मेरे सपनों की इबारत

घुल गई नमकीन पानी में ।

पीछे छूट गई,

एक नमी, खारापन और....

.... सिर्फ तनहाई ।।

Wednesday, September 2, 2009

शाश्वत

वह था, है..., रहेगा,
मिट नहीं सकता वजूद उसका
ढांप ले भले ही अहं की चादर से...
ये तो था, है... और रहेगा,
यूं ही बरकरार...
हमेशा.... हमेशा....
- देवेश

Thursday, February 19, 2009

मुक्तक

नेह के जल से तुम्हारे, चरण का अभिषेक कर लूँ।
मन मिला लूँ मन से तेरे, मन हमारे एक कर लूँ।।
कल्पना के चित्र सारे प्राण पा लें, जी उठें।
नाम बस तेरा पुकारूँ वचन का अतिरेक कर लूँ।।
- देवेश