Tuesday, February 24, 2009
दुनियादारी
आईने भी सीख गए हैं दुनियादारी।
जैसी चाहें दिखलाएं तस्वीर हमारी॥
गुरु, मित्र और वैद्य कभी कहते थे कड़वा।
अब देते हैं मीठी गोली बारी-बारी॥
लो गिरकिट के रंग; लोमड़ी सी चालाकी।
बदलो तुम भी बदल रही है दुनिया सारी॥
छल, बल से ही ताज धराते हैं सिर पर।
मक्कारी का नया नाम है दुनियादारी॥
दूर रखा कालिख से मुझको तूने मालिक।
'देव' झुकाए शीश, कहे तेरा आभारी॥
- देवेश
जैसी चाहें दिखलाएं तस्वीर हमारी॥
गुरु, मित्र और वैद्य कभी कहते थे कड़वा।
अब देते हैं मीठी गोली बारी-बारी॥
लो गिरकिट के रंग; लोमड़ी सी चालाकी।
बदलो तुम भी बदल रही है दुनिया सारी॥
छल, बल से ही ताज धराते हैं सिर पर।
मक्कारी का नया नाम है दुनियादारी॥
दूर रखा कालिख से मुझको तूने मालिक।
'देव' झुकाए शीश, कहे तेरा आभारी॥
- देवेश
Thursday, February 19, 2009
मुक्तक
नेह के जल से तुम्हारे, चरण का अभिषेक कर लूँ।
मन मिला लूँ मन से तेरे, मन हमारे एक कर लूँ।।
कल्पना के चित्र सारे प्राण पा लें, जी उठें।
नाम बस तेरा पुकारूँ वचन का अतिरेक कर लूँ।।
- देवेश
मन मिला लूँ मन से तेरे, मन हमारे एक कर लूँ।।
कल्पना के चित्र सारे प्राण पा लें, जी उठें।
नाम बस तेरा पुकारूँ वचन का अतिरेक कर लूँ।।
- देवेश
Wednesday, January 28, 2009
कुंडली
अजर अमर यह आत्मा, नश्वर है संसार।
सत्कर्मों से स्वयं का, करो जीव उद्धार॥
करो जीव उद्धार, फेर पछताते जग में।
अवसर जाता बीत, अश्रु रह जाते दृग में॥
कहत "देव" कविराय, मर्म यह जानो बंधु
सभी झिडकते हाथ, पकड़ते करुनासिंधु॥
- देवेश
Saturday, January 17, 2009
हे सखी..!!!
नेह का धागा सुलगता, हे सखी!
क्रोध की अग्नि में जलता, हे सखी!!
मौन में नवगुण भले कहले कॊई!
मौन में विद्रोह पलता, हे सखी!!
चाल चौसर की चले शातिर कॊई!
समय ऎसी चाल चलता, हे सखी!!
क़द्र जानॊ वक्त की तॊ ठीक वरना!
वक्त बीते हाथ मलता, हे सखी!!
"देव" में दुर्गुण तॊ गुण भी देखिए!
क्या तुझे हर पल ही खलता, हे सखी!!
- देवेश
Sunday, December 28, 2008
ग़ज़ल
आदर्शों की बात कहूं तो नादानी है।
अंधेरे को रात कहूं तो नादानी है।।
तुमको तुमसे, मुझको मुझसे फुर्सत कितनी।
फ़िर भी अपना साथ कहूं तो नादानी है।।
मरणासन्न देह में किसका रक्त चढ़ाया।
प्राण बचे फ़िर जात कहूं तो नादानी है।।
झूठे, नकली, दोहरे चेहरे वाले लोग।
इनसे दिल की बात कहूं तो नादानी है।।
अपने करम भुगतने सबको पड़ते "देव"
इसे समय की घात कहूं तो नादानी है।।
- देवेश
Monday, December 15, 2008
सरस्वती-वंदना
श्वेत वसन धारण करती हो,श्वेत पद्म पर हो आसीन.
ज्ञान रश्मियां बिखराते हैं, कृपा प्राप्त कर मेधाहीन.
कवि-कोविद पूजा करते हैं और अर्चना देव महान.
ज्ञान-राशि दो मात शारदा, मांग रहा मैं सेवक दीन।
वीणा, पुस्तक, स्फटिक-मालिका, माता कर शोभित होती।
बुद्धि और विद्या की देवी भक्तों के दुःख हर लेती।
ज्ञानालोक प्राप्त कर जननी, सघन तिमिर को दूर करूं।
जिह्वा पर तुम सदा बिराजो अमृत बिन्दु छलकाती।
- देवेश
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